चंद्र ग्रहण पर किया दान होता है महादान, दूर हो जाते हैं सारे कष्ट

भारतीय शास्त्रों में ग्रहण को धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर इस समय दान पुण्य का बड़ा महत्व बताया है। ज्योतिष में ग्रहण का फल: ग्रहण का फल मास, नक्षत्र और वार के अनुसार अलग-अलग होता है। निर्णय सिंधु में लिखा गया है कि ग्रहण में श्राद्ध अति पुण्यदायी है।

नास्तिकता से जो नहीं करता है वह कीचड़ में फंसी हुई गौ के तुल्य दुख भोगता है। जो सविधि श्राद्ध के माध्यम से दान देता है मानो उसने संपूर्ण पृथ्वी ही भूसुर को दान कर दी हो ऐसा फल प्राप्त होता है। अन्न से रहित स्वर्ण आदि अनेक वस्तुओं से ग्रहण के समय होने वाला श्राद्ध तब तक पितरों को सुख देता है जब तक सूर्य चंद्रमा रहते हैं। सूर्यग्रहण पड़े तब सूर्य का जप तथा सूर्य का ही दान करना चाहिए और चंद्रग्रहण के समय राहु का जप और राहु का दान करना चाहिए।

ग्रहण में दान का विशेष महत्व

- ग्रहण में सभी दान भूमि दान तुल्य, समस्त ब्राह्मण ब्रह्म के समान और समस्त जल गंगाजल के बराबर होता है। इन्दोर्लक्षगुणं पुण्यं रवेर्दशगुणं तु तत:। गंगादि तीर्थ सम्प्राप्तौ प्रौक्तं कोटिगुणं भर्वे।।

- ग्रहण के समय यदि सामथ्र्य हो तो भूमि, गांव, सोना, धान्य आदि दान करने चाहिए। गाय के दान से सूर्य लोक की प्राप्ति, बैल के दान से शिव लोक की प्राप्ति, स्वर्ण के दान से ऐश्वर्य की, स्वर्ण निर्मित सर्प के दान से राजपद, घोड़े के दान से बैंकुंठ की तथा अन्न दान करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है।

ग्रहण के समय वर्जित कर्म:

- ग्रहण काल में सोना, भोजन करना, मूर्ति स्पर्श करना, मल मूत्र आदि त्यागना वर्जित है। इसमें बालक, वृद्ध और रोगी को छूट दी गई है। इसके अतिरिक्त ग्रहण काल में मैथुन एवं हास्य विनोद आदि का भी निषेध किया गया है। चंद्रग्रहे त्रियामार्वाक् सूर्ये यामचतुष्टर्य। अन्नपानादिकं वज्र्य बालवृद्धातुरैर्विना।।

-चंद्रग्रहण में 3 याम (प्रहर) पूर्व और सूर्य ग्रहण में 4 प्रहर पहले से अन्नादि का ग्रहण बाल, वृद्ध व रोगियों को छोड़कर नहीं करना चाहिए।

ग्रहों का उपाय, मंत्र जप आदि एवं पूजा विधान:
दैवज्ञ मनोहर ग्रंथ के अनुसार यदि जन्म राशि में ग्रहण हो तो घात, दूसरी में हानि, तीसरी में धनागम, चैथी में ध्वंस, पांचवीं में पुत्र चिंता, छठी में सुख, सातवीं में स्त्री वियोग, आठवीं में रोग, नवीं में सम्मान नाश, दसवीं में सिद्धि, ग्यारहवीं में लाभ और बारहवीं में ग्रहण होने पर अपाय विश्लेष होता है। अत: ग्रहण जनित दोष को दूर करने के लिए जप, पूजा, दान आदि अवश्य करना चाहिए। ग्रहण के समय दान देना ग्रहजनित दोषों को दूर करता है तथा इस समय पवित्र नदियों में स्नान करना दोष शामक एवं पुण्यदायक माना जाता है। सर्वभूमिसमं दानं सर्वें ब्रह्मसमा द्विजा:। सर्वंगंगा समं तोयं ग्रहणे चंद्रसूर्यंयो:।।
***