अनेक रोगो की एक औषधि तुलसी तुलसी एक दिव्य पौधा है।

तुलसी की पत्तियां सर्वरोगनाशक है (Tulsi Medicinal use)। इनका प्रयोग विभिन्न रोगो में कई प्रकार से किया जाता है परन्तु निचे दी गयी विधि से तुलसी की पत्तियों को सेवन करने से प्राय: सभी रोग दूर करने में आश्चर्यजनक सफलता मिलती है। तुलसी की पत्तियों के इस्तमाल के पहले सर्वप्रथम रोगी की आयु, शक्ति, रोग की प्रकृति और मौसम को ध्यान में रखते हुए मध्यम आकार की, तुलसी की पत्तियों की मात्रा तय कर लेनी चाहिए।

तुलसी की प्रकृति गर्म है, अत: गर्मी के मौसम में कम मात्रा और सर्दी में कुछ ज्यादा मात्रा लेनी चाहिए कैंसर जैसे गंभीर रोगो में 25 से 100 पत्तियों ( बड़ो के लिए ) और 5 से 25 पत्तियां ( बालको के लिए ) ली जा सकती है फिर भी प्रारम्भ में आवश्यकता अनुसार 21 से 35 पत्तियां लेना ही पर्याप्त है। अधिकतर रोगो में सामान्यत: 7 से लेकर 11 पत्तियों ( बड़ो के लिए ) और 3 से 5 पत्तियों ( बालको के लिए ) की खुराक लेने से भी अच्छे परिणाम मिले है। एक व्यक्ति का कोड जैसा सात साल पूर्ण चरम रोग केवल तीन पत्तियां ( बरिक्तम घोटी हुई ) दैनिक सेवन करने से ही ठीक हो गया।

गर्म प्रकृति वालों को अधिक मात्रा में तुलसी की पत्तियों के सेवन से शरीर के भीतर जलन या चेहरे आदि पर कदाचित गर्मी के दाने निकल जाये तो ऐसी स्थिति में पत्तियों की मात्रा कम कर दें या प्रयोग बंद कर दें। मात्रा तय करने के बाद आवश्यकता अनुसार तुलसी की पत्तियां लेकर इस्तमाल से पहले उन्हें पानी से साफ़ कर लेना चाहिए।

तुलसी सेवन की सामान्य विधि
आवश्यकता अनुसार 7 से 21 ताजी हरी तुलसी की पत्तियां लेकर स्वच्छ खरल या सिलबट्टे ( जिस पर मसाला न पिसा गया हो ) पर बारीक़ पीसकर चटनी सी बना लें और इसे 50 से 125 ग्राम दही में मिलकर नित्य प्रात: खली पेट 2-3 मास तक लें। ध्यान रहे की दही खट्टा न हो। यदि दही माफिक न आये तो इस चटनी में एक दो चम्मच शहद मिलाकर लें। कफ और श्वसन संस्थान के रोगो तथा छोटे बच्चों को बारीक़ पीसी हुई तुलसी की पत्तियां शहद में मिलाकर दें। दूध के साथ भूलकर भी न दे। ( अन्य ओषधि के साथ तुलसी की पत्तियों की चाय में दूध मिलाया जा सकता है ) ओषधि की पहली मात्रा सुबह दातुन और मुंह साफ़ करने के बाद खाली पेट लें। आधा एक घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते है।

उपरोक्त विधि से दवा दिन भर में एक बार ही लेना पर्याप्त है परन्तु कैंसर जैसे असह्म दर्द वाले और कष्टप्रद जानलेवा रोगों में दिन में 2-3 बार भी ले सकते है। दवा सेवन के दिनों में सुपाच्य शाकाहारी प्राकृतिक भोजन करना चाहिए और तेज मिर्च, मसालेदार, चटपटे और तले हुए आहार से बचना चाहिए। साथ ही योग एवं ध्यान, टहलने और लम्बे स्वास की क्रियाओ का अभ्यास किया जाए तो अधिक और शीघ्र लाभ की आशा की जा सकती है।

विशेष - तुलसी के बारे में कुछ आवश्यक जानकारी
1. आयुर्वेद के अनुसार तुलसी हल्की उष्ण, तीक्ष्ण, कटु, रुक्ष, पाचन शक्ति को बढ़ाने वाली, कृमि और दुर्गंधनाशक, दूषित कफ तथा वायु को शांत करने वाली, पसली के दर्द को मिटाने वाली, ह्रदय के लिए हितकारी, मूत्रकृच्छ के कष्ट को मिटाने वाली, विषविकार, कोढ़, अनेक चरम रोग, हिचकी, उलटी, खांसी, स्वास, नेत्र रोगों आदि में लाभकारी है।

2. तुलसी की कई जातियां है, परन्तु साधारण: ओषधि के लिए सर्वत्र सदा सुलभ पवित्र तुलसी का प्रयोग किया जाता है। जो दो प्रकार होती है- एक हरी पत्तियां वाली स्वेत तुलसी और दूसरी कृष्ण रंग की पत्तियों वाली स्यामा तुलसी।

3. तुलसी के पौध में प्रबल विदयुत्त शक्ति होती है जो उसके चारों तरफ दो सो गज तक प्रवाहित होती रहती है। जिस घर में लहलहाता तुलसी का पौधा है, उस पर आकाश की बिजली नही गिरती, मच्छर तथा विष्णु नही परंपते और बीमारियां दूर भागती है।
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